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नसीब पर कविता "अपना-अपना एक नसीब"

नसीब पर कविता "अपना-अपना एक नसीब"

नसीब पर कविता


यहाँ सब ही का होता है 
अपना-अपना एक नसीब
सदियों से चली आ रही
इस दुनिया की ये ही रीत
जो मुझ पर है उसकी मुझको 
कदर अभी  क्यों होती नहीं
ऊंचे से करना चाहूँ बराबरी
पर कभी भी यह सोचा नहीं
जो मुझ पर है वो भी तो शायद
हर किसी को तो मिलता नहीं
क्यों नहीं कभी खतम होती
यह हिरस की राह जो मैंने है चली ?

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