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जीवन पर कविता |कैसा है जीवन संग्राम

जीवन पर कविता | कैसा है जीवन संग्राम



कैसा है यह जीवन- संग्रामहोता है बड़ा कठिन यह कामपूरे जीवन इसके ही खातिरहम ना करते बिलकुल आरामजीवन के हर इक मोड़ परसंग्राम बिना कहे संग चल देअपने ही भाई-बहनों संग हमबचपन में खिलौंनों पर झगड़तेऔर जब समझदार हो जाते तोउनसे जायदाद पर उलझ पड़तेरोज सुबह आफिस के लिएबसों में हैं ठुस -ठुस के भरतेकिसी से गलती से हाथ लग जायेतो सारे एक से ही चिपट पड़तेकभी तो सिर्फ़ एक रोटी के लिएदीन-हीन आपस में लिपट पड़तेऔर कभी एक लड़की की खातिरदो दोस्त भी बंदूकें चलाया करतेचाहे अच्छा करके या फिर बुरा सब ही तो चाँहे हैं बढ़ना यहाँ इस कर्म में हम सबका नाम हैक्या बच्चे-बूढे या फिर जवान हैंअरे प्यारे इसी का नाम तो जीवन-संग्राम हैहां इसी का नाम तो जीवन-संग्राम है

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6 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना

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  2. कविता सराहने के लिए,शुक्रिया लोकेशजी ।

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  3. जीवन संग्राम जिससे हर कोई रोज़ साक्षात्कार करता है ...
    पल पल संघर्ष करता है शायद यही है और तोमे इसे करना होगा इंसान को ... शायद यह नियति भी है ...

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  4. आभार, दिगम्बरजी ।

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  5. सुन्दर यथार्थपरक चित्रण। वाह। बहुत खूब।

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