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बालकविता "आओ बच्चों तुम्हे समझाऊँ "



आओ बच्चों तुम्हे समझाऊँ
एक बात पते की मैं बतलाऊँ
जीवन में कुछ हांसिल कर सको
उस रास्ते पर चलना सिखलाऊँ
घर से ही तुम यह शुरुवात करो
माता–पिता,बड़ों का सम्मान करो
गुरुओं को भी हमेशा करो नमन
और सत्य के मार्ग पर बढ़े चलो
नित्य सुबह तुम जल्दी से उठके
नहा–धोकर प्रभु से विनती करके
नियम से जो दोगे पढ़ने पर ध्यान
धीरे–धीरे मेधावी तुम बन जाओगे
खेल-कूद को भी समय से करना
और करना सभी महत्वपूर्ण व्यायाम
स्वस्थय शरीर ना जो होगा तुम्हारा
तो पूरे होंगे कैसे बाकी के काम
छोटी –छोटी और काम की बातें
सीखो बुजुर्गों से कुछ तुम जाके
मार्गदर्शन से सभी बड़े जनों के
एक बालक बन सकता है गुणवान  

कविता "मंजिल की तलाश में"

मंजिल की तलाश में मैं 
भटक रहा हूँ इधर-उधर
न जाने कब शाम हुई 
न जाने कब हुई सहर
न जाने कब हंसी थी आई
अब दर्द बढ़ रहा हर पेहर 
डर लगता है के ये जिंदगी
बन जाये न मुश्किल सफ़र
जिसे समझा हमने हमनवा 
वही न समझे अब हाल-ऐ-दिल
न जाने ये किस्मत को है मंजूर
या अरमानो से खेलना बना
हमारे यार का पसंदीदा दस्तूर
इस ही कशमाकश में बीत रही है
जिस्म की हर एक सांस 
होकर के बड़ी ही मजबूर



कविता"ओ मेरे ख्यालों के शहजादे "


ओ मेरे ख्यालों के शहजादे 
बताओ हकीक़त में
तुम कब आओगे
नहीं गुजरता लम्हा तुम बिन
कब तक यूँही 
मुझको तड़पाओगे 

जब तुम मेरे साथ होते
सारे आलम हसीं है होते
और जब खुल जातीं अंखिया
रेत की तरहा सब जा फिसलते

तेरे दीदार को पाने को हम 
पहरों तलक सोया हैं करते
लेकिन ख्वाब तो ख्वाब ही होते 
ये तो कभी ना हैं पूरे होते










बाबुल पर कविता "बाबुल तेरे घर का अंगनारा"

बाबुल पर कविता "बाबुल तेरे  घर का अंगनारा"


बाबुल तेरे 
घर का अंगनारा 
लगता है
जहाँ से प्यारा 
आँखें अब भी 
नम हो जातीं
जब होता है
छोड़ कर के आना 

वो माँ के हाँथ से 
सर की मालिश करवाना
वो दादी की गोद में
सब गम भुला लेट जाना
वो भाई का अनोखे 
मुंह बना के चिढ़ाना
कैसे पंख लगा के
उड़ गया वो जमाना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

वो दरवाज़ों खिडकियों 
का मुझको तकते जाना
वो घर की चिड़ियों का
मुझे देखकर चेह्चहाना
कुछ और दिन मैं 
चाहूँ यहाँ पर बिता दूँ
मन चाहता दुबारा
उस बचपन को पाना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

क्या लगती थी बगल के
चाचा की मलाईदार कुल्फी
वो जीभर के समोसे
और जलेबियों को खाना
वो पापा के संग में
बाज़ार को  जाना 
जो भी जी को को भाजाता
उसे लेकर के आना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

वो करना चांहे 
जितनी भी बदमाशी
कभी -कभी हल्की सी 
फटकार भी खा जाना 
कितनी प्यारी हैं बचपन 
की खट्टी मिट्ठी यादें
वो भाभी से रूठना 
और फिर पल में मान जाना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

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बाल कविता"मोटी आंटी"






पड़ोस के घर में रहने वाली
मोटी आंटी बड़ी हैं प्यारी
अंकलजी तो हैं दुबले–पतले
जोड़ी इनकी लगती न्यारी
काम हैं उनको दो ही भाते
एक खाना और करनी बातें
जब वो हमारे घर पर आयें
दो–तीन घंटे बैठ के जाएँ
इधर-उधर की सारी ख़बरें
सबसे पहले उनसे मिल जाएँ
अंकलजी की आधी तनखा तो
वो तो शॉपिंग पर उड़ाएँ
लेकिन उनमें फुर्ती इतनी
बच्चों संग हैं रेस लगाएँ
पड़ोस के घर में रहने वाली
मोटी आंटी बड़ी हैं प्यारी


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"परी रानी"















परी पर बालकविता"परी रानी"


परी पर बालकविता"परी रानी"

परी पर बालकविता"परी रानी"


ओ मेरे सपनों में आने वाली
सफेद और सुंदर बड़े परों वाली
परी रानी तुम असली में आओ
ढेर सारी मांगे हैं मेरी तुम
एक – एक कर पूरा कर जाओ
टॉफी का एक पेड़ लगा दो
और जूस की एक नदी बना दो
बहुत सारे खिलौने दिलवा दो
और उड़ने वाली कार भी ला दो
मम्मी – पापा पर टाइम नहीं होता
एक लम्बा सा हॉलिडे मनवा दो
स्कूल बैग हो गए बहुत ही भारी
उनका थोड़ा वज़न कम करवा दो
सब लोग बहुत पानी हैं बहाते
थोड़ा उनको भी आकर समझा दो
परी रानी तुम यहाँ भी आकर
धरति हमारी स्वर्ग बनाओ


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