कविता "धरती माँ"




धरती माँ तुम 
दिखती थी
कितनी प्यारी
हर रंग से
भरी थी चूनर
तब तुम्हारी
अपने आँचल में
छुपाकर करती
थी ,तुम हम 
सबकी स्नेह से 
पहरेदारी,जीने के 
लिए सब ही 
जरुरी स्रोत थे
हमको दिए 
जिससे संवर पाई
थी ,दुनिया भी हमारी
कितना सुन्दर और
 स्वच्छ  वातावरण
तुमने हमे दिया
था कभी
पर हमने लालच 
के वशीभूत होकर
तुम पर ही वार
कर दिया 
बेटे(वृक्ष ) तुम्हारे काट
दिये और बेटी (नदी) भी
अपवित्र कर डाली 
अब हमने ही 
तुम्हारी सखाओं (हवा)
को गंदे धुंए 
से  भर दिया 
फिर भी हम 
कहते हैं के 
इसमें गलती 
क्या है हमारी
अपनी माँ का एक-एक
श्रृंगार(पर्वत और पशु -पक्षी )
हमने ही तो  छीन लिया
माँ फिर भी
निभा रही है
रो- रो के अपनी 
जिम्मेवारी
पर अब हमारी
माँ को. हमारी जरुरत
है आ पड़ी
करो वो सब काम
मिल-जुल कर जिससे
माँ फिर पहले
की तरह खुशहाल
दिखे,क्योंकि सिर्फ 
बूढ़े कंधे पर नहीं
दे सकते,हम
यह भारी जिम्मेवारी 
पोंछ दो इन आँसुओं 
को तुम माँ के 
समय अब आ गया 
अगर माँ ही नहीं रहेगी 
तो न होगा अस्तित्व 
भी हम सबका 

अर्चना






कविता "हमारी जिंदगी"




जैसे-जैसे हर दिन बढ़ती जाती है जिंदगी
कुछ नए अनुभव सिखा जाती है जिंदगी
कुछ को अपना और कुछ को पराया कर देती है जिंदगी
फिर भी कितनी हसीन लगती है हमको हमारी जिंदगी

वक़्त के साथ रंग भी बदलती है जिंदगी
बहुत अजीब हालातों से जूझती है जिंदगी
कभी थोड़ा सा पाती और बहुत कुछ खोती है जिंदगी
मगर हर हाल में भी नहीं हार मानती है हमारी जिंदगी

कभी एक अनसुलझी पहेली लगती है जिंदगी
कभी एक मीठा स्वप्न लगती है जिंदगी
कभी ख़ुशी में नाचती और कभी तनहा भटकती है जिंदगी
फिर भी हम सभी को जीनी होती है यह हमारी जिंदगी 





कविता "वो दिल की बात"




वो दिल की बात
नहीं समझ पाते
इशारों में हमने 
करी उनसे कई बातें
पर हर बार हम
ही पागल बन जाते
और वो चुप-चाप
सामने से निकल जाते
पहले तो उन्ही ने
हमें ख़त भेजा 
और हमसे हमारा
हाल-ऐ-दिल पूछा
अब  बताओ कैसे
हम सीधे इज़हार करें 
कहने मैं हमें भी
इश्क उनसे बहुत 
ही ज्यादा शर्म लगे
पर वो तो इतने
 नासमझ नहीं 
शायद वो हमको
तड़पाना चाहें
अब हम भी कुछ
दिन को उनसे 
नहीं मिलायेंगे 
अपनी नज़रें 
देखेंगे फिर वो
भी कैसे रहते हैं
इस दर्द -ऐ-इश्क को
दिल में रखके







कविता"वो दीवाने"

 

अब नहीं
मिलते वो दीवानें
लैला मजनू के
किस्से पुराने
नाम रह गया
बस इश्क का
अब कोई प्यार को
क्या जाने
तुलने लगी हैं
मोहब्बतें
अब पैसे के
बाजार में
दिल की ना
समझे कोई
चाहें कोई कितना
प्यार दे
पाक़ होती थीं
वो मोहब्बत
झूठ की ना
थी इजाज़त
अब तो दगाऐं
खाने लगें हैं
यार अपने
प्यार से
प्यार को ही
तो खुदा
वो थे
अपना मानते
अब तो हद
ये हो गयी
कि हम भी
डरने लगे हैं
प्यार  से


कविता"सिर्फ साल में चार ही दिन औरत को है"





सिर्फ साल में
चार ही दिन 
औरत को है
पूजा जाता
बाकि के दिनों
में क्यों
अत्याचार है 
किया जाता 
बचपन से ही
बेटी को ही 
बार-बार रोका
टोका जाता
यह मत कर
वो कर ले 
पाठों को है
पढाया जाता 
क्यों नहीं बेटों
को भी यह
सब ज्ञान है 
दिया जाता 
औरत की इज्जत
करना बचपन
से कोई क्यों
नहीं सिखाता
औरत नहीं होती
कोई वस्तु
फिर क्यों उसको 
बेचा जाता 
लड़केवालों को दिखाने
के लिए 
बार-बार क्यों नुमाइश
बनाया जाता
औरत ही हो
जाती क्यों 
एक औरत की
दुश्मन है 
अपने पति और बेटे
की गलतियों पर
क्यों परदे को है
डाला जाता
क्यों इतना सारा 
बहू और बेटी में 
फर्क है किया जाता 
शादी के अलावा भी
होते हैं कुछ बेटी 
के मन के सपने
क्यों नहीं उसको 
भी सपने पूरा
करने का मौका है
दिया जाता
उसमे भी बेटे
सी छमता
यह  हमारे समझ  
अभी भी क्यों 
नहीं है आता
अगर माँ -बाप ही 
साथ न देते तो क्या
साक्षी और पी.वी.सिन्धु 
कोई भी बन पाता
कहने वाले कहते 
रहते हैं इससे 
फर्क नहीं कुछ भी 
है पड़ पाता
जब लाती हैं बेटियां
गोल्ड मेडल्स 
तो घर ही क्या
देश का नाम भी
रौशन हो जाता