कविता"बाल मजदूरी"

बाल मजदूरी


नन्हे-नन्हे हाथों में 
थमा दिये बड़े- बड़े औजार
क्यों मासूम से फूलों पे
हम करते इतना अत्याचार

अभी तो बस चलना  सीखा
चढ़ा दिया मेहनत की सीढ़ी
बचपन इनका छीन लिया 
चेहरे से मुस्कान भी छीनी

गुड़िया-खिलौनों के बदले में
झाड़ू पोंछा थमा दिये बस
ये न जाने क्या हो स्कूल
हो जाते कुसंगतियों के वशीभूत

क्या वापस आएगा बचपन
क्या देखेंगे कभी ये यौवन
ये भी बन सकते हैं तारे
 रह जाते बस धूल में मिलकर 

परिवार समाज या इनकी गरीबी
करती है इनको मजबूर
पर हम तो हैं बहुत सभ्यसमाजी
फिर भी चुप हैं रहते क्यों

क्यों न हम सब आगे आयें
बेड़ियों से इन्हें छुडाएं 
बाल-मजदूरी को हम रोके
इनके जीवन को भी सजाएँ

अर्चना




6 comments:

  1. शुभ प्रभात
    सटीक विचार
    सादर

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 20 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. सूचना देने के लिए धन्यवाद |

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  4. अभी तो बस चलना सीखा
    चढ़ा दिया मेहनत की सीढ़ी
    सुंदर रचना।

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