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कविता "ऊँचा उड़ने की चाह "


ऊँचा उड़ने की चाह 



"निम्न कविता में मैंने एक औरत के मन के विचार प्रकट किये हैं |"



पास मेरे है सब कुछ 
फिर भी कुछ कमी है
कई दिनों से नींद भी
आँखों से खो गयी है
लगने लगा है बस जिंदगी
क्यों चार दीवारी में सिमट गयी है 
अब तो मन ने फिर से
ऊँचा उड़ने की चाह की है  

प्रीतम को हौंसला दिया
बच्चों को आँचल की छाया
बुजुर्गों की लाठी बनी जब
नाज़ुक समय था आया
कदम तो उठाया है
मीलों भी चलना चाहूँ
अब तो मन ने फिर से
ऊँचा उड़ने  की चाह की है  

रिश्तों को भी संभाला है
दीवारों को भी सजाया है
फिर भी नाम अपना 
एक गृहणी बस है पाया
चाहत अब यह है मेरी 
कि बड़ा नाम  मैं कमाऊँ
अब तो मन ने फिर से
ऊँचा उड़ने  की चाह की है  


दिल की अब यही आरजू
और यही तमन्ना है
कि काश मैं बना पाऊं
अपनी एक पहचान को 
इस बार दुआ में यही 
रब से तो माँग की है
अब तो मन ने फिर से
ऊँचा उड़ने की चाह की है  

अब है मैंने ठाना
और ये प्रण  की है
गुमनामियों में अब तो
मैं ना कतई जियुंगी
अपने लिए भी कुछ पल
वक़्त से मैं छीन लूँगी
लगा के आशाओं के पर
सफलता को अब छूऊँगी

सोचा है जितना मन ने
उससे भी ऊँचा उडूँगी
मैं बहुत  ऊँचा उडूँगी
हाँ , मैं बहुत ऊँचा उडूँगी







शिव-भजन "हे नीलकंठ भोले भंडारी"


हे नीलकंठ भोले भंडारी


"इस भजन मैं एक भक्त अपने भगवान् से अपने कष्ट कह रही है"



मेरे महेश्वर ,मेरे कैलाशी 
मेरे शिव शंकर,हो मेरे शिव शंकर

हे नीलकंठ भोले भंडारी
मुझपर भी अब उपकार करो
मैं फँसी संसार की  माया में
मुझ अज्ञानी को दरस तो दो
मेरे भोले अब तुम दया करो 
आकर मुझको सही मार्ग कहो 
हाँ ,आकर मुझको सही मार्ग कहो
हाँ ,आकर मुझको सही मार्ग कहो
मेरे महेश्वर,मेरे कैलाशी ,
मेरे शिव शंकर,हो मेरे शिव शंकर

मैं भी मंदिर मैं आऊँगी 
तुम्हे भाँग- धतूरा चढ़ाऊँगी
दूध-दही से अभिषेक कराऊँगी
सुन लो अब और ना परीक्षा लो
मेरे भोले अब तुम दया करो 
आकर मुझको सही मार्ग कहो 
हाँ आकर मुझको सही मार्ग कहो
हाँ आकर मुझको सही मार्ग कहो

मेरे महेश्वर,मेरे कैलाशी 
मेरे शिव शंकर,हो मेरे शिव शंकर

मैं नंगे पैरों जाऊँगीं
गंगाजी से कांवर लाऊँगी
आकर के तुम्हे नेहलाऊँगी
मेरी आस को अब तो पूरा करो
मेरे भोले अब तुम दया करो 
आकर मुझको सही मार्ग कहो 
हाँ आकर मुझको सही मार्ग कहो
हाँ आकर मुझको सही मार्ग कहो

मेरे महेश्वर ,मेरे कैलाशी 
मेरे शिव शंकर,हो मेरे शिव शंकर

तुम तो हो नाथ अंतरयामी
 फिर कैसे ना मेरी पीड़ा जानी
इस धरती और गगन में प्रभु
सब मानते हैं जो तुम कह दो
मेरे भोले अब तुम दया करो 
आकर  मुझको सही मार्ग कहो 
हाँ आकर मुझको सही मार्ग कहो
हाँ आकर मुझको सही मार्ग कहो

मेरे महेश्वर ,मेरे कैलाशी 
मेरे शिव शंकर, हो मेरे शिव शंकर


कविता "यादें"




यादें


"निम्नलिखित  कविता में एक प्रेमिका अपने बीते दिनों को याद कर रही है"


जब यादों ने
बड़ा तडपाया
और याद बीता
 हुआ कल आया
जा  खोला
उस संदूक को
जो भरा था
तेरी निशानियों से
कुछ खट्टी और
कुछ मीठी
हम दोनों की 
शैतानियों से
थी उसमे अपनी
कुछ  तस्वीरें 
जो बयां करती हैं 
कि साथ में तेरे थे
हम कितना खुश 
और जहाँ को थे 
हम तो भूले
न रह पाते थे
एक दिन बिन मिले
इस कदर थे
हम एक -दूजे से जुड़े
कुछ सूखे गुलाबों 
के पत्ते 
जो अब भी हैं
किताबों में पड़े 
लगता है
अभी  भी ताज़े हैं
जैसे जिन्दा तेरी
सब यादे हैं
वो तेरे दिए
हुए दो कड़े
अब भी उतना ही
चमकते हैं
पर तू ही नहीं
है साथ मेरे 
इस बात को दिल
क्यों  ना माने
तेरे आखिरी ख़त 
को भी मैंने
बार बार लगाया 
 इस सीने से 
तेरी मजबूरियों
के चलते
हम हुए जुदा
तेरी राहों से
पर अब भी है
मुझे इंतज़ार
लगता है तुम
आ जाओगे
वर्ना जी लूँगी 
इन यादों के संग
ये यादें बहुत हैं
मेरे लिए
(अर्चना)



कविता "मेरी छत की छोटी सी मुंडेर पर"


मेरी छत की छोटी सी मुंडेर पर


"यह कविता मैंने अपने आस-पास के पंछियों के बारे में लिखी है"


मेरी छत की

छोटी सी मुंडेर पर
हर सुबह
महफ़िल है 
जुड़ जाती 
दाने खाने की
खातिर परिंदों
की जब टोलियाँ  
हैं आती
चिड़ियाँ आातीं 
दाना खातीं
फुदक -फुदक 
फिर गाना भी
गातीं लगती हैं 
बहुत ही प्यारी 
काली- भूरी और
छोटी बड़ी वाली
साथ ही आते
जंगली कबूतर
खायें दाना फिर
 नहाते भी जमकर
पर एक आहट भी 
होने पर 
उड़ जाते हैं
ये तो डरकर
गुटर -गुटर गू
और चूं -चूं से 
होती मेरी 
सुबह मनोहारी
मेरी छत की
छोटी सी मुंडेर पर
हर सुबह
महफ़िल है 
जुड़ जाती 
(अर्चना)



कविता " मैं अपने भारत देश को "


मैं अपने भारत देश को



"इस कविता में एक पिता अपने परदेसी बेटे के साथ जाने को मना करता है और अपनी जन्मभूमि का इस तरह गुणगान करता है"


मैं अपने भारत देश को
कहीं छोड़ के ना 
जा पाऊंगा
यहाँ की मिटटी की
खुशबू को 
शायद ही 
कहीं पाऊंगा
यहाँ की बोली
यहाँ की भाषा
सब  को अपने
पास बुलाती
कदम-कदम पर
बजती घंटियाँ
मन को हैं
हर्षित कर जाती
बड़ों का होता
बहुत ही आदर
छोटों की 
चलती मनमानी
माँयें घर में
सुबह -सुबह से 
ॐ जय जगदीश 
ये आरती गातीं
यहाँ के खाने की
बात निराली
बिन मिष्ठान 
सजती नहीं थाली
चटनी और अचार
जब हों तो
देखकर मुँह में
आ जाता पानी
मेला लगता
जगह-जगह पर
कभी होती ईद
कभी होती दिवाली
सब धर्मों को 
सम्मान मिला है
स्वर्ण मंदिर और जामा 
मस्जिद भी यहाँ हैं
मेरे वतन के
जैसी देखो
कहीं और यह बात
कहाँ है
इस धरती पर
ही चाहूँ मेरी
अंतिम सांसे 
भी कट जातीं
और मुझको 
गंगा मैया 
अपनी गोद में
 लेकर सुलातीं
(अर्चना)



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वीर जवान










कविता"यौवन"


यौवन


"प्रस्तुत कविता में मैंने यौवन के महत्व का उल्लेख किया है"


यौवन होता अतिमहत्वपूर्ण
ये जाए वापस न आये

जो इसमें सही राह चले है

कभी जीवन में वो हार न पाए

मार्गदर्शन बड़ों का होवे है
कदम- कदम सब साथ निभाएं
यदि अब सही साथ मिले 
तो पूरे जीवन आदर हैं पाए
बनती नींव है जीवन भर की 
स्वर्ण समय यही होता है भाई
इसी समय होती  है वो ऊर्जा
जो चाहें वो कर हैं पाए वर्ना 
तो फिर हाथ ही मलना कुछ
भी न फिर होवे पछताए
कुछ
भी न फिर होवे पछताए
(अर्चना)










कविता " मेरी दादी "

मेरी दादी 


"इस कविता के माध्यम से मैंने एक छोटे बच्चे और उसके प्रति दादी के स्नेह का वर्णन किया है"


मेरी दादी बड़ी ही प्यारी
मुझ पर जान लुटाने वाली
जब भी मैं हूँ गाँव को जाता

मुझको बाँहों में भर लेती 
फिर माथे और हथेलियों को
जी भर के है चूमा करती 
फिर पूछती राजा बेटा
अब तू बता के क्या खाएगा
चांहे कोई भी वक़्त हुआ हो
तनिक फिकर भी न है करती
लग जाती है चूल्हे पर फिर
साग और रोटी बनाया करती
मेरे लिए वो लड्डू बनाकर
पहले से ही डब्बा भर रखती
रात को अपनी गोद में लेती
बार- बार मेरी बलईयां लेती
पता नहीं कब मैं सो जाता
पर वो रात भर पंखा झलती
सुबह को मुझको  तैयार करके
बहुत सा काजल लगाया करती
और मुझे अपनी कमर पे लेकर
आस -पास है घुमाया करती
जब मै हूँ शहर आ जाता

फ़ोन पे है वो रोया करती
मेरी दादी सबसे प्यारी
हाँ ,मेरी दादी सबसे प्यारी

(अर्चना)



माता का भजन "मन में तू रटता ही जा "




मन में तू रटता ही जा 


"प्रस्तुत भजन में मैंने माँ की महिमा का उल्लेख करने की कोशिश की है|"


मन में तू रटता ही जा मईया- मईया
मईया कर देगी खुशियों की छईयां
सांसों से तू जपता जा मईया- मईया
मईया एक दिन पार लगा देगी नईया


जिसने माँ का नाम पुकारा  माँ ने उसको दिया सहारा
जिसने माँ का नाम पुकारा माँ ने उसको दिया सहारा
हाँ दिया सहारा, हाँ दिया सहारा
हाँ दिया सहारा, हाँ दिया सहारा
भवसागर से बचा लिया पकड़  के बइयां
हाँ,भवसागर से बचा लिया पकड़  के बइयां
मईया कर देगी खुशियों की छईयां
मईया एक दिन  पार लगा देगी नईया


भक्तजनों की  देखके पीड़ा मईया झट आ जाती है
भक्तजनों की  देखके पीड़ा मईया झट आ जाती है
आ जाती है आ जाती है
आ जाती है आ जाती है
शत्रु डर के मारे कहते हाय दईया
हाँ,शत्रु डर के मारे कहते हाय दईया
मईया कर देगी खुशियों की छईयां
मईया एक दिन  पार लगा देगी नईया


                                        शिवभजन पढ़ें
                                "आओ भोले बाबा आओ"

कविता " बच्चे "


बच्चे


"निम्नलिखित  कविता  बच्चों के कोमल मन तथा उनकी विशेषताओं को वर्णित करती है"


बच्चे होते मन के सच्चे
बड़े मासूम बहुत ही अच्छे
न जाने सही और गलत को
और करें बातें ज़रा सी हट के

चंदा को मामा हैं समझते 
और तारों में चाहें जाना
खुली आँखों से सपने बुनते
न जाने जग का ताना -बाना

ये वो हैं जो कभी न थकते
बड़े -बड़ो को थका के रखते
हिम्मत होती सबसे ज्यादा
गिर जाएँ तो भी प्रयत्न हैं करते



कोमल होता इनका तो मन
मुस्कुरादें तो सब दुख हैं हरते
डर जाते अनजानी आहट पे
माँ से जाकर जोर लिपटते


जिस घर में न दिखाई देते 
सूने दिखते आँगन उनके
और जहाँ ये जन्म ले लेते
रहे न कोई कमी उस घर में


भगवान् का दूजा रूप हैं होते
 हर दम बस खिलखिलाते रहते
जिसको भी मिल जाएँ बच्चे
फिर न ऊबने का उसे वक़्त मिले

(अर्चना)






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राहें

पता नहीं के 
कहाँ है मंजिल
पर हमको तो होता  
बढ़ना न जाने के
किस रस्ते पर
मिल जाए
कोई हमनवां
बस एक उम्मीद को
मन में लेकर
देते हैं सब 
वक़्त बिता
साथ अगर मिल 
जाता अच्छा 
तो हो जाता
दुगना  मजा
जिंदगी में नई- नई 
राहों का होता है
आना -जाना

(अर्चना)