कविता"अनजान रास्ते "



ये कैसे हैं अनजान रास्ते 
जिस ओर हम हैं बढ़े चले
लगता है डर कहीं बीच में
ये साथ हमारा ना छूट ले

आँधी भी है तूफान भी है
और आग का दरिया भी है
दुआ है अब खुदा से यही 
इन सबको पार कर सकें
ये कैसे हैं अनजान रास्ते 
जिस ओर हम हैं बढ़े चले

खुशियाँ कम और गम भरकर हैं
यहाँ रहना आंसू पीकर है
दुआ है अब खुदा से यही
कि हम तो फौलाद बन सकें
ये कैसे हैं अनजान रास्ते 
जिस ओर हम हैं बढ़े चले
लगता है डर कहीं बीच में
ये साथ हमारा ना छूट ले

कविता " जीवन- संग्राम"


कैसा है यह जीवन- संग्राम
होता है बड़ा कठिन यह काम
पूरे जीवन इसके ही खातिर
हम ना करते बिलकुल आराम
जीवन के हर इक मोड़ पर
संग्राम बिना कहे संग चल दे

अपने ही भाई-बहनों संग हम
बचपन में खिलौंनों पर झगड़ते
और जब समझदार हो जाते तो
उनसे जायदाद पर उलझ पड़ते

रोज सुबह आफिस के लिए
बसों में हैं ठुस -ठुस के भरते
किसी से गलती से हाथ लग जाये
तो सारे एक से ही चिपट पड़ते

कभी राशनों की कतार में
और तो और सस्ती सब्जी के बाजार में
धक्का-मुक्की से हम बचते-बचते
कभी चालाकी से भी कदम बढ़ाया करते

कभी तो सिर्फ़ एक रोटी के लिए
दीन-हीन आपस में लिपट पड़ते
और कभी एक लड़की की खातिर
दो दोस्त भी बंदूकें चलाया करते

चाहे अच्छा करके या फिर बुरा 
सब ही तो चाँहे हैं बढ़ना यहाँ 
इस कर्म में हम सबका नाम है
क्या बच्चे-बूढे या फिर जवान हैं

अरे प्यारे इसी का नाम तो जीवन-संग्राम है
हां इसी का नाम तो जीवन-संग्राम है







शिव भजन " आओ भोले बाबा कभी मेरे घर भी आओ "


आओ भोले बाबा कभी
मेरे घर भी आओ
कब से मैं हूँ आस किये
अब के मान जाओ
कब से मैं हूँ आस किये
अब के मान जाओ
हाँ मान जाओ भोले आओ 
बाबा आओ आ भी जाओ

कभी डमरू बजाते हुए 
तो कभी नृत्य तुम दिखाते हुए
कभी गंगा को साथ लिए 
या कभी त्रिशूल हाथ लिए 
नटराजन तुम किसी भी 
रूप में तो आओ
गंगाधर तुम किसी भी 
रूप में तो आओ
बस मैं तो प्रतिक्षा करूँ

अब के मान जाओ
कब से मैं हूँ आस किये
अब के मान जाओ
हाँ मान जाओ भोले आओ 
बाबा आओ आ भी जाओ

कभी राख को लगाए हुए
तो कभी भांग तुम चढ़ाए हुए
कभी साँप को लपेटे हुए
स्वामी तुम स्वांग करते नए- नए
विषधर तुम किसी भी 
रूप में तो आओ
अखिलेशवर मुझे तुम
हर रूप में ही भाओ 
बस मेरी है विनती आखिरी 


अब के मान जाओ
कब से मैं हूँ आस किये
अब के मान जाओ
हाँ मान जाओ भोले आओ 
बाबा आओ आ भी जाओ

नीलकंठ आओ जटाधर आओ
पशुपति आओ प्रजापति आओ 
महादेव आओ परमेश्वर आओ 
गिरिशवर आओ महेश्वर आओ 





कविता "भटक गया कुछ समय के लिए"



भटक गया कुछ समय के लिए
मैं अपनी मंजिल से तो
क्या हुआ 
बस थोड़ा सा थका हुआ हूँ  लेकिन
हारा मैं बिल्कुल भी 
नहीं हूं

फिर से कर लूंगा  नई शुरुआत
जिंदगी की
बाजुओं पर अपने तो मुझको है
पूरा यकीन
कमजोरी को अपनी मैं ताकत
बना दिखाऊंगा

जो खोया था हर हसीन पल मैंने
एक-एक गिनकर के वापस
ले आऊंगा
अपनों के होठों की मुस्कानों को
रब से कहकर वापस 
मँगवाऊंगा
अपनी मेहनत के रंगों से
किस्मत की लकीरों को मैं
सँवरवाऊंगा
 बनकर के एक मील का पत्थर
मैं औरों को भी राह
दिखाऊँगा

भटक गया कुछ समय के लिए
मैं अपनी मंजिल से तो
क्या हुआ 

माता का भजन "कैसे बताऊँ शब्दों में मैं "




कैसे बताऊँ शब्दों में मैं तेरी मेहरबानियाँ
कण-कण में तू ही तो बसती  माता शेरावालिया

हर एक रूप में बहुत ही जचती माता शेरावालिया
हर एक रूप में बहुत ही जचती माता शेरावालिया

हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया
हो भर दे झोलियाँ जो दिखती खालियाँ
कैसे बताऊँ शब्दों में मैं तेरी मेहरबानियाँ

औरों को तो महल दे दिए
पर खुद रहती पर्वत पर
जीवन को रौशन करती है 
ज्वाला माता बनकर 
ज्वाला माता बनकर 
ज्वाला माता बनकर 
जीवन को रौशन करती है 
ज्वाला माता बनकर 
हर युग में लिखती हो तुम 
अपनी ममता की कहानियाँ
हर युग में लिखती हो तुम 
अपनी ममता की कहानियाँ

हो शेरावालिया पहाड़ावालिया
हो भर दे झोलियाँ जो दिखती खालियाँ
कैसे बताऊँ शब्दों में मैं तेरी मेहरबानियाँ

माँ का दिल माँ का होता है
ये छोटा- बड़ा न जाने 
चाहें कितनी करें गलतियां
बच्चे तो माँ को प्यारे
बच्चे तो माँ को प्यारे
बच्चे तो माँ को प्यारे
चाहें कितनी करें गलतियां
बच्चे तो माँ को प्यारे
बालक  जो तुम्हे पुकारे तो 
सब छोड़ के आनेवालियाँ 
बालक  जो तुम्हे पुकारे तो 

सब छोड़ के आनेवालियाँ 

हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया
हो भर दे झोलियाँ जो दिखती खालियाँ

कैसे बताऊँ शब्दों में मैं तेरी मेहरबानियाँ
कण -कण में तू ही तो बसती  माता शेरावालिया
हर एक रूप में बहुत ही जचती माता शेरावालिया
हर एक रूप में बहुत ही जचती माता शेरावालिया

हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया
हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया
हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया
हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया
हो शेरावालिया  पहाड़ावालिया








कविता "उजली-सी हर कली है दिखती"



उजली-सी हर कली है दिखती
और धरती ने कर लिया श्रृंगार
वर्षा ने तो प्रसन्न कर दिया 
हर एक डाली हर एक पात 
खुशबू मिटटी की फैली है
एक-एक कण में आया निखार
क्या कोयल और क्या पपीहा
सुना रहे हैं मिलन का राग 
अब तो सब के पंख आ गये
थमते नहीं धरती पर पाँव
क्या इंसान और क्या पशु-पंछी
हर्षित हुए कर वर्षा में स्नान






कविता" हाँ तुमने सही कहा था माँ"




हाँ तुमने सही कहा था माँ
हाँ तुमने सच ही कहा था माँ

लेकिन मैं ही था नादान 
शायद मैं ही था अंजान
इस दुनिया के इंसानों से
मुखोटे पहने हुए हैवानो से

कि कुछ ऐसे गलत लोग 
तेरे जीवन में भी आयेंगे
फिर अपनी चिकनी-चुपड़ी
बातों से तुम्हे भ्रमित करवायेंगे


बस तुम रहना इनसे बहुत ही
सावधान देना सिर्फ अपनी पढाई
पर ध्यान वर्ना तो तुम खो
दोगे अपने अस्तित्व की पहचान

पर माँ मैंने तुम्हारी न एक सुनी
करता  रहा बस अपनी मर्जी झूठे
मित्रों पर किया विश्वास  फिर
तो वो ही सब हो गया जो 
स्वप्न में भी ना था मैंने सोचा

अब दूसरे मित्रों को देखता हूँ
तो बहुत मन में पछताता हूँ
कोई बन गया है डॉक्टर तो 
कोई बहुत बड़ा अफसर 

लेकिन मुझे ना कोई पथ मिला
मैं ही भटकुं बस इधर -उधर
अब तुम्हारी बातें याद आती है
मन में कई सवाल उठाती हैं

क्यों मैंने न कहा तेरा माना
क्यों बन के रह गया बेचारा
अब तो बस मैं सबसे ये कहूँ
ना ऐसे मित्रों पर विश्वास करो

जो आंधी की तरह आते है 
सब कुछ तबाह कर जाते है
तुम सब भी इतना याद रखो
 माँ की दी सीखों का ध्यान रखो






  










बालकविता "आओ बच्चों तुम्हे समझाऊँ "



आओ बच्चों तुम्हे समझाऊँ
एक बात पते की मैं बतलाऊँ
जीवन में कुछ हांसिल कर सको
उस रास्ते पर चलना सिखलाऊँ
घर से ही तुम यह शुरुवात करो
माता–पिता,बड़ों का सम्मान करो
गुरुओं को भी हमेशा करो नमन
और सत्य के मार्ग पर बढ़े चलो
नित्य सुबह तुम जल्दी से उठके
नहा–धोकर प्रभु से विनती करके
नियम से जो दोगे पढ़ने पर ध्यान
धीरे–धीरे मेधावी तुम बन जाओगे
खेल-कूद को भी समय से करना
और करना सभी महत्वपूर्ण व्यायाम
स्वस्थय शरीर ना जो होगा तुम्हारा
तो पूरे होंगे कैसे बाकी के काम
छोटी –छोटी और काम की बातें
सीखो बुजुर्गों से कुछ तुम जाके
मार्गदर्शन से सभी बड़े जनों के
एक बालक बन सकता है गुणवान  

कविता "मंजिल की तलाश में"

मंजिल की तलाश में मैं 
भटक रहा हूँ इधर-उधर
न जाने कब शाम हुई 
न जाने कब हुई सहर
न जाने कब हंसी थी आई
अब दर्द बढ़ रहा हर पेहर 
डर लगता है के ये जिंदगी
बन जाये न मुश्किल सफ़र
जिसे समझा हमने हमनवा 
वही न समझे अब हाल-ऐ-दिल
न जाने ये किस्मत को है मंजूर
या अरमानो से खेलना बना
हमारे यार का पसंदीदा दस्तूर
इस ही कशमाकश में बीत रही है
जिस्म की हर एक सांस 
होकर के बड़ी ही मजबूर



कविता"ओ मेरे ख्यालों के शहजादे "


ओ मेरे ख्यालों के शहजादे 
बताओ हकीक़त में
तुम कब आओगे
नहीं गुजरता लम्हा तुम बिन
कब तक यूँही 
मुझको तड़पाओगे 

जब तुम मेरे साथ होते
सारे आलम हसीं है होते
और जब खुल जातीं अंखिया
रेत की तरहा सब जा फिसलते

तेरे दीदार को पाने को हम 
पहरों तलक सोया हैं करते
लेकिन ख्वाब तो ख्वाब ही होते 
ये तो कभी ना हैं पूरे होते










कविता "बाबुल तेरे घर का अंगनारा"


बाबुल तेरे 
घर का अंगनारा 
लगता है
जहाँ से प्यारा 
आँखें अब भी 
नम हो जातीं
जब होता है
छोड़ कर के आना 

वो माँ के हाँथ से 
सर की मालिश करवाना
वो दादी की गोद में
सब गम भुला लेट जाना
वो भाई का अनोखे 
मुंह बना के चिढ़ाना
कैसे पंख लगा के
उड़ गया वो जमाना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

वो दरवाज़ों खिडकियों 
का मुझको तकते जाना
वो घर की चिड़ियों का
मुझे देखकर चेह्चहाना
कुछ और दिन मैं 
चाहूँ यहाँ पर बिता दूँ
मन चाहता दुबारा
उस बचपन को पाना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

क्या लगती थी बगल के
चाचा की मलाईदार कुल्फी
वो जीभर के समोसे
और जलेबियों को खाना
वो पापा के संग में
बाज़ार को  जाना 
जो भी जी को को भाजाता
उसे लेकर के आना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

वो करना चांहे 
जितनी भी बदमाशी
कभी -कभी हल्की सी 
फटकार भी खा जाना 
कितनी प्यारी हैं बचपन 
की खट्टी मिट्ठी यादें
वो भाभी से रूठना 
और फिर पल में मान जाना
आँखें अब भी
नम हो जातीं
जब होता है 
छोड़ कर के आना 
बाबुल तेरे
घर का अंगनारा 
लगता है 
जहाँ से प्यारा 

















बाल कविता"मोटी आंटी"






पड़ोस के घर में रहने वाली
मोटी आंटी बड़ी हैं प्यारी
अंकलजी तो हैं दुबले–पतले
जोड़ी इनकी लगती न्यारी
काम हैं उनको दो ही भाते
एक खाना और करनी बातें
जब वो हमारे घर पर आयें
दो–तीन घंटे बैठ के जाएँ
इधर-उधर की सारी ख़बरें
सबसे पहले उनसे मिल जाएँ
अंकलजी की आधी तनखा तो
वो तो शॉपिंग पर उड़ाएँ
लेकिन उनमें फुर्ती इतनी
बच्चों संग हैं रेस लगाएँ
पड़ोस के घर में रहने वाली
मोटी आंटी बड़ी हैं प्यारी














बालकविता"परी रानी"




परी रानी

ओ मेरे सपनों में आने वाली
सफेद और सुंदर बड़े परों वाली
परी रानी तुम असली में आओ
ढेर सारी मांगे हैं मेरी तुम
एक – एक कर पूरा कर जाओ
टॉफी का एक पेड़ लगा दो
और जूस की एक नदी बना दो
बहुत सारे खिलौने दिलवा दो
और उड़ने वाली कार भी ला दो
मम्मी – पापा पर टाइम नहीं होता
एक लम्बा सा हॉलिडे मनवा दो
स्कूल बैग हो गए बहुत ही भारी
उनका थोड़ा वज़न कम करवा दो
सब लोग बहुत पानी हैं बहाते
थोड़ा उनको भी आकर समझा दो
परी रानी तुम यहाँ भी आकर
धरति हमारी स्वर्ग बनाओ






कविता "धरती माँ"




धरती माँ तुम 
दिखती थी
कितनी प्यारी
हर रंग से
भरी थी चूनर
तब तुम्हारी
अपने आँचल में
छुपाकर करती
थी ,तुम हम 
सबकी स्नेह से 
पहरेदारी,जीने के 
लिए सब ही 
जरुरी स्रोत थे
हमको दिए 
जिससे संवर पाई
थी ,दुनिया भी हमारी
कितना सुन्दर और
 स्वच्छ  वातावरण
तुमने हमे दिया
था कभी
पर हमने लालच 
के वशीभूत होकर
तुम पर ही वार
कर दिया 
बेटे(वृक्ष ) तुम्हारे काट
दिये और बेटी (नदी) भी
अपवित्र कर डाली 
अब हमने ही 
तुम्हारी सखाओं (हवा)
को गंदे धुंए 
से  भर दिया 
फिर भी हम 
कहते हैं के 
इसमें गलती 
क्या है हमारी
अपनी माँ का एक-एक
श्रृंगार(पर्वत और पशु -पक्षी )
हमने ही तो  छीन लिया
माँ फिर भी
निभा रही है
रो- रो के अपनी 
जिम्मेवारी
पर अब हमारी
माँ को. हमारी जरुरत
है आ पड़ी
करो वो सब काम
मिल-जुल कर जिससे
माँ फिर पहले
की तरह खुशहाल
दिखे,क्योंकि सिर्फ 
बूढ़े कंधे पर नहीं
दे सकते,हम
यह भारी जिम्मेवारी 
पोंछ दो इन आँसुओं 
को तुम माँ के 
समय अब आ गया 
अगर माँ ही नहीं रहेगी 
तो न होगा अस्तित्व 
भी हम सबका 

अर्चना






कविता "हमारी जिंदगी"




जैसे-जैसे हर दिन बढ़ती जाती है जिंदगी
कुछ नए अनुभव सिखा जाती है जिंदगी
कुछ को अपना और कुछ को पराया कर देती है जिंदगी
फिर भी कितनी हसीन लगती है हमको हमारी जिंदगी

वक़्त के साथ रंग भी बदलती है जिंदगी
बहुत अजीब हालातों से जूझती है जिंदगी
कभी थोड़ा सा पाती और बहुत कुछ खोती है जिंदगी
मगर हर हाल में भी नहीं हार मानती है हमारी जिंदगी

कभी एक अनसुलझी पहेली लगती है जिंदगी
कभी एक मीठा स्वप्न लगती है जिंदगी
कभी ख़ुशी में नाचती और कभी तनहा भटकती है जिंदगी
फिर भी हम सभी को जीनी होती है यह हमारी जिंदगी 





कविता "वो दिल की बात"




वो दिल की बात
नहीं समझ पाते
इशारों में हमने 
करी उनसे कई बातें
पर हर बार हम
ही पागल बन जाते
और वो चुप-चाप
सामने से निकल जाते
पहले तो उन्ही ने
हमें ख़त भेजा 
और हमसे हमारा
हाल-ऐ-दिल पूछा
अब  बताओ कैसे
हम सीधे इज़हार करें 
कहने मैं हमें भी
इश्क उनसे बहुत 
ही ज्यादा शर्म लगे
पर वो तो इतने
 नासमझ नहीं 
शायद वो हमको
तड़पाना चाहें
अब हम भी कुछ
दिन को उनसे 
नहीं मिलायेंगे 
अपनी नज़रें 
देखेंगे फिर वो
भी कैसे रहते हैं
इस दर्द -ऐ-इश्क को
दिल में रखके







कविता"वो दीवाने"

 

अब नहीं
मिलते वो दीवानें
लैला मजनू के
किस्से पुराने
नाम रह गया
बस इश्क का
अब कोई प्यार को
क्या जाने
तुलने लगी हैं
मोहब्बतें
अब पैसे के
बाजार में
दिल की ना
समझे कोई
चाहें कोई कितना
प्यार दे
पाक़ होती थीं
वो मोहब्बत
झूठ की ना
थी इजाज़त
अब तो दगाऐं
खाने लगें हैं
यार अपने
प्यार से
प्यार को ही
तो खुदा
वो थे
अपना मानते
अब तो हद
ये हो गयी
कि हम भी
डरने लगे हैं
प्यार  से